कि हसरतें हैं इस क़दर..

   ताज़ा ग़ज़ल 💐

कि हसरतें हैं इस क़दर
कि जाँ लगे है मुख़्तसर

यहाँ तो मंज़िलें नहीं
है रहगुज़र ही रहगुज़र

वो कितनी ही नसीहतें
गँवा चुकी हैं अब असर

हमारी हिर्स ही हमें
बना रही है जानवर

बस अपनी राह देखते
हैं आज के ये राहबर

है और कोई भी नहीं
बशर का ख़ौफ़ है बशर

गले लगालूँ फिर उसे
वो प्यार से मिले अगर

जहाँ है फिर से घात में
रहो हमेशा जाग कर

'जेहद' जहाँ को नाश के
कहो न है तरक़्क़ी पर !

   ~जावेद जेहद

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