पनपते हैं जब भी मोहब्बत के साए..
ताज़ा ग़ज़ल 💐
पनपते हैं जब भी मोहब्बत के साए
उन्हें रौंद देते हैं नफ़रत के साए ।।
शहर गांव जंगल, जवां बच्चे बूढ़े
सभी पर हैं अब तो सियासत के साए
कहीं पे तरक़्क़ी, कहीं भुखमरी है
कहीं क़त्ल-ओ-ग़ारत, बग़ावत के साए
भिखारी, सियाने, फ़रेबी, लुटेरे
हैं कितनी तरह के हुकूमत के साए
हाँ कुछ छांव देते हैं दुनिया में अच्छी
सब अच्छे नहीं हैं हुकूमत के साए ।
जो ख़ुद को समझते बड़ी शान वाले
हैं उनपे भी कुछ तो हिक़ारत के साए
है दर्द-ओ-अलम की कड़ी धूप हर सू
कहाँ छुप गए सब मुसर्रत के साए ?
ये दुनिया हसीं है मगर हाए इसको
अज़ल से हैं घेरे क़यामत के साए
ग़ज़ल के बज़ारों में मंदी नहीं है
भले ही हैं लुढ़के तिजारत के साए
रहे उनपे रहमत ख़ुदा की 'जेहद' जी
हैं जिनकी भी मुझपे मोहब्बत के साए
~जावेद जेहद
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