रुत मोहब्बत की, क़दम फूलों का..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐
बहरे-रमल मुसद्दस मख़बून मुसक्कन
2122. 1122  22 / 112

रुत मोहब्बत की, क़दम फूलों का
फिर न लाया  वो सनम फूलों का

जाने क्यों मुझको चुभे कांटे ही
जब कभी चाहा करम फूलों का

हँसते फूलों को निहारे हैं सभी
किसने देखा है अलम फूलों का

है मिरे चारों तरफ़ फुलवारी
फिर भी है मुझको तो ग़म फूलों का

क्या कहें उसके लबों की नर्मी
उसका तो है जी क़दम फूलों का

आम फूलों का है ये बाग़ नहीं
बाग़ है ये तो अहम फूलों का

फूल हाथों में, गले, जूड़े में
फूल पे है ये करम फूलों का

फूल बदलेंगे कहानी अपनी
ये यक़ी है या वहम फूलों का

तुम तो कांटों में 'जहद' जीते हो
फिर भी क्यों भरते हो दम फूलों का

    ~जावेद जहद

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