न सिदाक़त रही न शराफ़त रही..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐

न सिदाक़त रही न शराफ़त रही
सिर्फ़ बाक़ी दिलों में सियासत रही

कोई मजबूर कोई रज़ामंद है
अब सलामत कहीं भी न इस्मत रही

इज़्ज़तो-आबरू का ज़माना गया
नाम की अब हमारी ये अज़मत रही

जो हमारे लिए थे बुरे रहनुमा
दुख है उनसे ही सबको ही क़ुर्बत रही

क्यों नशे में हुकूमत के रहते हो चूर
कब हमेशा किसी की हुकूमत रही

फिर फ़सादों ने वीरां किया शह्र को
रोकने की किसी में न हिम्मत रही

हर तरफ़ है उदासी सी छाई 'जेहद'
पहले सी अब कहाँ वो मुसर्रत रही

    ~जावेद जेहद

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