कुछ हसरतें निकल गईं, कुछ बाक़ी हैं अभी..
ताज़ा ग़ज़ल 💐
कुछ हसरतें नकल गईं, कुछ बाक़ी हैं अभी
यानी ज़मीनें दिल की मिरे प्यासी हैं अभी
इतने सितम पे तो चली आतीं क़यामतें
शायद ख़ुदा की रहमतें कुछ बाक़ी हैं अभी
जब इल्म से सँवरती है ये ज़िंदगी तो फिर
क्यों शम्मएं बुझी-बुझी रूहानी हैं अभी ?
अपने लहू से सींचने वाले ये बाग़ को
इक दो नहीं करोड़ों ही तो माली हैं अभी
ऐ पंछियों उड़ाने ज़रा भरना सोच के
झोंके हवाओं के बड़े तूफ़ानी हैं अभी
जलवा हसीं दिखा के यूं भागा न कीजिए
ऐ जान-ए-जाँ, निगाहें मिरी प्यासी हैं अभी
ऐ दिल उचट गया है तू इतना जहाँ से क्यूँ
सुब्हें हसीन, शामें भी मस्तानी हैं अभी !!
वो हमसे कब थे बिछड़े मगर लगता है 'जहद'
हम सब के बीच 'मीर', 'जिगर', 'हाली' हैं अभी
~जावेद जहद
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