एक ही ज़मीन में दो ग़ज़ल..

      1..ग़ज़ल 💐

ये किस तरह के समंदर का यार साहिल है
यहाँ तो चारों तरफ़ चाहतों की महफ़िल है

ये उठती लहरें, थपेड़े, हवाओं के झोंके
यहाँ की रुत तो क़सम से बड़ी ही क़ातिल है

हैं ख़ुशनसीब यहाँ पर हैं जिनके भी बंगले
सुकून-ओ-चैन यहाँ कितना उनको हासिल है

तुम्हारी बांहों में दिल भूल जाता है हर ग़म
सदा ये ऐसे रहे, जैसे आज ग़ाफ़िल है !!

यहाँ पे कैसी सुबह, कैसी शाम, कैसी रात
यहाँ का सारा ही पल हर घड़ी ही झिलमिल है

मोहब्बतों की ये बातों को कौन समझेगा
वही तो समझेगा, दिल जिसका यार बिसमिल है

हसीं ये सारे नज़ारे हैं कहते क्या न 'जेहद'
समझते हम ही नहीं हैं, यही तो मुश्किल है
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        2..ग़ज़ल 💐

ये कैसी दुनिया है, कैसी अजीब महफ़िल है
यहाँ अँधेरा बहुत है, ये फिर भी झिलमिल है

ये मार-काट, लड़ाई, बुरा-बुराई, जलन
ये दुनिया आज भी देखो तो कितनी जाहिल है

वफ़ाएं, प्यार-मोहब्बत, ख़ुलूस-ओ-हमदर्दी
ये दुनिया कितनी ही अच्छाइयों की क़ातिल है

है एक मुद्दा सुलझता तो दूजा आ जाता
बड़ी ही ये भी तो यारो अजीब मुश्किल है

भले ही यूँ तो यहाँ पर हैं मंज़िलें लाखों
मगर ये सच है, यहाँ कोई भी न मंज़िल है

ये शब्द, शेर, ये ग़ज़लें तो मैं नहीं कहता
ये सारा काम तो करता हमारा ये दिल है

बुरे का होता है अंजाम भी बुरा ही 'जहद'
बुराई करने से तो और कुछ न हासिल है

       ~जावेद जहद

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