शिकस्ता दिल और मगन में है जी..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐

शिकस्ता दिल और मगन में है जी
ये कैसा दिल इस बदन में  है  जी

लपकता उनपे ये दिल कभी था
अब अपनी ही ये शरण में  है जी

उन्हें है पाना बस एक धुन थी
ये दिल कईं अब लगन में है जी

हैं जाँद कितने तो कैसे कह दूँ
कि चाँद बस इक गगन में है जी

वो कैसा है जो लुटा के सबकुछ
क़रार-ओ-चैन-ओ-अमन में है जी

किसी भी शायर की कामयाबी
बस उसके मश्क़-ए-सुख़न में है जी

ये कैसा उड़ने का शौक़ जागा
हर एक पंछी गगन में है जी !

उसे न तुम दो नज़र से देखो
जो अपने ही इस वतन में है जी

किसी भी तहज़ीब मेंं न होगी
जो बात गंग-ओ-जमन में है जी

'जेहद' न जानो सहल इसे तुम
बड़ा परिश्रम सुख़न में है जी ।

     ~जावेद जेहद

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