छल-कपट, झगड़ा, अदावात पे रोना आया..

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छल-कपट, झगड़ा, अदावात पे रोना आया
इस जहाँ के बुरे  हालात पे रोना आया ।।

इस चमन का तो भला कर न सका तू भी बहुत
तेरी सूखी हुई बरसात पे रोना आया ।।

जो बुरा करते हैं उनको ही भला कहते हो
आपके अंधे ख़यालात पे रोना आया ।।

हो भरा जिसमें तबाही के सिवा कुछ भी नहीं
ऐसे तो आतिशी जज़्बात पे रोना आया ।।

क्या कहें, कितनी ही बातों से हुआ दिल छलनी
और कितने ही बयानात पे रोना आया ।।

साथ हो जुर्म-ओ-गुनाहों का या मक्कारी का
ऐसे तो दुनिया के हर साथ पे रोना आया ।।

आज तक जितनी भी जंगें हुईं और झगड़े हुए
उन सभी जीत पे और मात पे रोना आया ।।

मुस्तहिक़ जो थे नहीं, उनको भी जो तमग़े मिले
मुझको उन झूठे इनामात पे रोना आया ।।

हैं बुरे तो बुरे, कितने ही शरीफ़ों की 'जहद'
वहशियों जैसी ख़ुराफ़ात पे रोना आया ।।

     ~जावेद जहद

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