थिरकते रहते हैं हरदम मटकते रहते हैं..

    ताज़ा ग़ज़ल 💐

थिरकते रहते हैं हरदम, मटकते रहते हैं
ये इतना आप सनम क्यों सनकते रहते हैं

तुम्हारे अंग में क्य ऐसा है भरा जानाँ
ये अंग क्यों तिरे इतने लचकते रहते हैं

उलझ गया है कोई क्या हसीन ज़ुल्फ़ों में
ये इतना आप इसे क्यों झटकते रहते हैं

समझ में आती नहीं आपकी कोई हरकत
हमेशा आप तो मुझको खटकते रहते हैं !

चमक बनावटी नग-मोती की है मिट जाती
कि असली हीरे तो हरदम चमकते रहते हैं

जिधर है जाना, उधर को नहीं पहुंचते जो
तमाम उम्र. वो यूँ ही.भटकते रहते हैं !!

बला की चीज़ हैं ये शेर भी सुनो.यारो
दुरुस्त लाख हों फिर भी खटकते रहते हैं

शराब हद से ज़्यादा जो पीते रहते हैं
बहुत बुरे वो शराबी महकते रहते हैं

न जाने कब मिरा भी शेर कोई चमकेगा
किसी-किसी के तो कितने दमकते रहते हैं

'जेहद' बुलंदियों की फ़िक्र तुम किया न करो
वहाँ पहुंच के भी कितने सरकते रहते हैं !!

         ~जावेद जहद

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