इन दिनों क्या है बात कांटों की..
ताज़ा ग़ज़ल 💐
इन दिनों क्या है बात कांटोंं की
हर तरफ़ है बरात कांटों की
चुभते रहते हैं और क्या करते
बस यही तो सिफ़ात कांटों की
पहले फूलों की थी मगर अब तो
सुब्ह कांटों की, रात कांटों की
क्या पता कब किसे ये चुभ जाएं
कौन जाने है घात कांटों की !!
उनका सारा कलाम. ज़हरीला
उनकी सारी ही बात कांटों की
जितना करना था कर लिया आफ़त
हो रही अब तो मात कांटों की ।।
है ये तेरा तो ऐसा रूप 'जेहद'
जैसे फूलों में ज़ात कांटों की
~जावेद जेहद
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