किसी का प्यार कभी देखा यूँ गहरा तो नहीं..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐

किसी का प्यार कभी देखा यूँ गहरा तो नहीं
कहीं ये दोनों वही मजनूँ-ओ-लैला  तो  नहीं

सता के तुम मुझे क्यों चाहते हो हमदर्दी 
कहीं ये पड़ गया जानम तुम्हें मँहगा तो नहीं

जहाँ भी देखिए फैली हुई है उर्यानी
नहीं थी ऐसी, कोई और ये दुनिया तो नहीं

फिर नज़र प्यार से वो मुझसे मिलाने है लगा
वो मुझे देगा कहीं फिर वही धोखा तो नहीं

हम सुना देते हैं अक्सर सभी को ग़म अपना
किसी से जबकि हमें चाहिए कहना तो नहीं

हुक्म सब उनका बताओ भला मैं क्यों मानूँ
उसने चाहा है मुझे, मुझको ख़रीदा तो नहीं

बला जो सामने होती उसे भी पढ़ न सके
जहाँ ये होने लगा है कहीं अंधा तो नहीं

जहाँ का.ज़्यादा ज़यां आप ही तो करते हैं
खुला ये सच है, कोई झूठ का दुखड़ा तो नहीं

चला ये आया ज़माना कहो अब कैसा मियाँ
बुरा या अच्छा, रहा अब कोई पर्दा तो नहीं

सज़ा वो देता है अक्सर ग़मों के मारों को
मिरे वो शह्र का मुंसिफ़ कहीं अंधा तो नहीं

मिरी भी शायरी गूंजेगी 'जेहद' दुनिया में
ये मैं भी.देख रहा हूँ कोई सपना तो नहीं

         ~जावेद जहद

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