एक दिन मेरी ऐसी चढ़ी तेवरी..
ताज़ा ग़ज़ल
एक दिन मेरी ऐसी चढ़ी तेवरी
इक बनाई ग़ज़ल तो बनी "तेवरी"
यूँ तो थी दिलनशीं सर से वो पैर तक
पर मुझे उसकी अच्छी लगी तेवरी !!
कल तलक तेवरों से भरे जो भी थे
आज उनकी भी ठंडी पड़ी तेवरी !
लोग सारे ज़माने को कर देते ठीक
पर न अबतक सही से चढ़ी तेवरी
जिनकी रहती है ठंडी सितम के ख़िलाफ़
वो रहेगी मरी की मरी तेवरी !!
एक हीरो मरा तो हुआ क्या नहीं
लोग भूखे मरे न चढ़ी तेवरी !!
तुम न पूछो मिरी शायरी का मिज़ाज
जाने कैसी है मेरी अभी तेवरी !!
"तेवरी" जब लिखो तो रहे ये ख़याल
हो विरोधों के रस से भरी "तेवरी"
ये ज़रूरी नहीं दिलनशीं हो 'जहद'
चाँद-तारों से उनकी भरी तेवरी !!
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