या ख़ुदा, कैसा है ये दिन आया..
ताज़ा ग़ज़ल
या ख़ुदा, कैसा है ये दिन आया
हर तरफ़ दर्द-ओ-ग़म का है साया
हाए कमज़र्फ़ ये तिरा अशरफ़
अर्श से फ़र्श पे चला आया !!
पा लिया मैंने जैसे सबकुछ ही
फिर भी रहता है दिल ये घबराया
बुझता जाता है दीप ख़ुशियों का
बढ़ता जाता है दर्द का साया !!
जाने कबतक रहेगा मंडराता
ये तशद्दुद, ये जंग का साया !
हो गई दिल की सब नमी ग़ायब
सारे रिश्तों का फूल मुरझाया !!
आओ तहज़ीब-ए-नव पे ये सोचें
"हमने क्या खोया, हमने क्या पाया"
दिल को कितना सुकून देता है
ये मुहब्बत, ये प्यार का साया !
अब 'जहद' ऐसी तुम ग़ज़ल लिक्खो
जिस से दुनिया की दूर हो माया !!
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