रह-रह के मय छलकती रही कोई रात भर..

       ताज़ा ग़ज़ल

रह-रह के मय छलकती रही कोई रात भर
पी-पी के शय बहकती रही कोई रात भर !

देती रही हवा किसी जज़्बात को फ़िज़ा
इक आग सी भड़कती रही कोई रात भर

मज़बूत थी गिरफ़्त मगर जाने क्या हुआ
होंठों से लय सरकती रही कोई रात भर

इतनी सियाह रात थी उस काली रात की
ख़ुद में नज़र भटकती रही कोई रात भर

शबनम की बूंद गिरती रही उसके जिस्म पर
खिलके कली महकती रही कोई रात भर !!

न जाने कैसा था नशा उस रात में 'जहद'
गिरके पलक संभलती रही कोई रात भर
            जावेेद जहद 

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