आशिक़, मजनूँ, दीवाना था..

         #ताज़ा_ग़ज़ल

आशिक़, मजनूँ, दीवाना था
मैं तेरे लिए क्या- क्या ना था

बस प्यार की बातें होती थीं
अपना भी वो क्या ज़माना था

दिल मेरा  प्यासा था तेरा
आँखों का तिरी पैमाना था

हर रात शमा तू बनती थी
मैं बन जाता  परवाना था

हम सारी हद से गुज़र जाते
बस रौ में हमें बह जाना था

जो प्यार में  गाते रहते थे
कितना वो प्यारा गाना था

तूने ही कभी  मौक़ा न दिया
क्या-क्या तुमको बतलाना था

ख़्वाबों की परी थी, हो गई छू
उड़ जाने का तो बहाना था !!

महलों से उठी चिंगारी थी
और ख़ाक हुआ काशाना था

ये नफ़रत, वो उलफ़त का 'जहद'
इक ये है, इक वो ज़माना था !!
                      जावेेद जहद

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