तुम्हारी क्या वफ़ा है, हम नहीं समझे..

        ताज़ा ग़ज़ल

तुम्हारी क्या वफ़ा है, हम नहीं समझे
लहर,आंधी है क्या है, हम नहीं समझे

ये सब कैसी अदा है, हम नहीं समझे
मिलन में लब सिला है, हम नहीं समझे

तुम्हारे भेद तो हैं  सारे ही न्यारे
तुम्हारा रूप क्या है, हम नहीं समझे

हमारी क्या लगन है, जानते हो तुम
तुम्हारी चाह क्या है, हम नहीं समझे

तड़पता है तुम्हारा दिल मिलन को जब
क़दम फिर क्यों रुका है, हम नहीं समझे

तुम्हें हम भूलना तो  चाहते हैं पर
तुम्हीँ में दिल लगा है, हम नहीं समझे

बहुत नज़दीक से देखा मगर फिर भी
मोहब्बत क्या बला है हम नहीं समझे

ये कैसा है सियासत का जहाँ यारो
कि इसका धर्म क्या है, हम नहीं समझे

किसी की लूट कर इज़्ज़त 'जहद' आख़िर
किसी को क्या मिला है, हम नहीं समझे !!
                  जावेेद जहद सहसरामी

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