मोहब्बत अब दिलों में इस तरह कम होती जाती है..

          ताज़ा ग़ज़ल

मोहब्बत अब दिलों में इस तरह कम होती जाती है 
कि जैसे  धूप में ये ख़ुश्क  शबनम  होती  जाती  है

ये कैसी  छिड़ गई है  हर तरफ़ ही  जंग दुनिया में
बिछी जाती हैं लाशें, आँख पुर-नम होती जाती है

तुम्हारे चाँद, सूरज  और सितारे  बुझते जाते हैं
तिरी दुनिया भी क्या ग़म का ही आलम होती जाती है

हमारी शक्ल से तुम जितनी नफ़रत करते जाते हो
हमें उतनी मोहब्बत तुमसे जानम होती जाती है !!

बस इक बचपन का मौसम होता है जी शादमानी का
उमर बढ़ती है ज्यों ज्यों दफ़्तर-ए-ग़म होती जाती है 

कोई आराम से  करता है शायर  शायरी कैसे
यहाँ तो कुछ न कुछ तख़्लीक़ हरदम होती जाती है

तरक़्क़ी करती जाती है 'जहद' ये देखिए जितनी
ये दुनिया और भी जैसे जहन्नम होती जाती है !!
                   #जावेेद_जहद

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