आग, पानी, चाँदनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा..

               #ताज़ा_ग़ज़ल 💐

आग, पानी, चाँदनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा
है यही तो  ज़िंदगी,  रौशनी, ख़ुश्बू, हवा

तीरगी, बदबू, उमस, ज़िंदगी की बेकली
ज़िंदगी की चाशनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा

इक जगह जब हों ये तो सुर सजे संगीत का
ये भी जैसे रागिनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !!

आज कोई जश्न है या किसी का वस्ल है
आज कितनी है खिली, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा

तुम थे मेरे साथ तो कितनी मेरे पास थी
तुम गए तो खो गई, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा

इक फ़रेबी हुस्न और मसनवी श्रृंगार है
शह्र में न गाँव सी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !

अंगिनत अल्फ़ाज़ हैं, अंगिनत मौज़ू मगर
किसकी है न शायरी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा

ये यहाँ की शय नहीं, इसमें कोई शक नहीं
ये तो हैं जी जन्नती, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !!

कहते हैं क्या-क्या सभी, मैंने भी ये कह दिया
इल्म और शाइस्तगी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !!

तेज़ भाती है किसे, हर किसी को ही 'जहद'
अच्छी लगती गुनगुनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !!
                 जावेेद जहद सहसरामी

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