मुद्दत से मैं जो एक ग़ज़ल सोच रहा हूँ..
ताज़ा ग़ज़ल
बनती नहीं वो उम्दा शकल सोच रहा हूँ
वो जिससे निकलती हैं सदा आग की लपटें
किस तर्ह खिला है वो कँवल सोच रहा हूँ !!
हो जाए बरी जिससे जहाँ सारे दुखों से
इक ऐसा ही मैं कोई अमल सोच रहा हूँ
मुझ जैसा ज़माने में बशर कोई नहीं है
क्या है कोई भी मेरा बदल सोच रहा हूँ
कब सोती है जी चैन से ये आज की दुनिया
कब नींद मे होता है ख़लल सोच रहा हूँ !!
पहले तो तमन्नाओं में उलझा लिया ख़ूद को
अब ज़िंदगी हो जाए सहल सोच रहा हूँ !!
वो प्यार का इज़हार तो करते नहीं पहले
कर दूंगा कभी मैं ही पहल सोच रहा हूँ !
दिल इश्क़ में बिगड़ा तो बिगड़ता ही रहा फिर
कैसे कोई जाता है सँभल सोच रहा हूँ !!
इक हद की बुलंदी लिए सोचा था 'जहद' कुछ
अब उससे ज़रा आगे निकल सोच रहा हूँ !!
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