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थिरकते रहते हैं हरदम मटकते रहते हैं..

    ताज़ा ग़ज़ल 💐 थिरकते रहते हैं हरदम, मटकते रहते हैं ये इतना आप सनम क्यों सनकते रहते हैं तुम्हारे अंग में क्य ऐसा है भरा जानाँ ये अंग क्यों तिरे इतने लचकते रहते हैं उलझ गया है कोई क्या हसीन ज़ुल्फ़ों में ये इतना आप इसे क्यों झटकते रहते हैं समझ में आती नहीं आपकी कोई हरकत हमेशा आप तो मुझको खटकते रहते हैं ! चमक बनावटी नग-मोती की है मिट जाती कि असली हीरे तो हरदम चमकते रहते हैं जिधर है जाना, उधर को नहीं पहुंचते जो तमाम उम्र. वो यूँ ही.भटकते रहते हैं !! बला की चीज़ हैं ये शेर भी सुनो.यारो दुरुस्त लाख हों फिर भी खटकते रहते हैं शराब हद से ज़्यादा जो पीते रहते हैं बहुत बुरे वो शराबी महकते रहते हैं न जाने कब मिरा भी शेर कोई चमकेगा किसी-किसी के तो कितने दमकते रहते हैं 'जेहद' बुलंदियों की फ़िक्र तुम किया न करो वहाँ पहुंच के भी कितने सरकते रहते हैं !!          ~जावेद जहद

जो ख़्वाब आँखों में आकर हँसाया करते हैं..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 जो ख़्वाब आँखों में आकर हँसाया करते हैं कभी-कभी वही बेहद  रुलाया करते हैं !! है जिनपे फ़र्ज़ हमें हर तरह से ख़ुश रखना तरह-तरह से वही क्यूँ  सताया करते हैं ? जो रूठ जाएं उन्हें छोड़ो मत कभी यूँँ ही ख़फ़ा जो रहते है उनको मनाया करते हैं उठा दो ऐसी शपथ जिसका एहतिराम नहीं रखो वही जिसे सारे  निभाया करते हैं !! हम उनकी क़द्र करें कैसे दोस्तो बोलो जो अपना भार-वज़न ख़ुद गिराया करते हैं ये ज़ात-पात, फ़सादात, छल को मौत आए उन्हें भी आग लगे जो सिखाया करते हैं !! जो जानते नहीं, वो क्या दिखाएं बेचारे जो जानते हैं, हुनर वो दिखाया करते हैं ये बार-बार 'जेहद' मौक़ा उनको क्या देना निकम्मे हों जो उन्हें तो हटाया करते हैं !!        ~जावेद जहद

या ख़ुदा, कैसी ये बला आई..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 या ख़ुदा, कैसी ये बला आई हर तरफ़ मौत बनके है छाई घिर गईं कैसे ये अँधेरों में सारी दुनिया की सारी रानाई हर तरफ़ दर्द-ओ-ग़म है, मातम है ढोल बजता कहीं न शहनाई !! क्या पता क्या ख़ता हुई हमसे कैसे जुर्मों की है सज़ा पाई !! अब हवा भी भली नहीं लगती कैसी पछिया रे कैसी पुरवाई चल रहा था बहुत दिनों से खेल शक्ति से शक्ति अब है टकराई ! हम वफ़ा ख़ुद ही उससे कर न सके क्या हुआ, वो हुआ जो हरजाई !! मैं तो उस्ताद ख़ुद को कहता नहीं लोग समझें तो क्या करूँ भाई !! आपदा है बहुत बड़ी ये 'जहद' मिलके इमदाद सब करो भाई         ~जावेद जहद

अब गो कोरोना, तू गो कोरोना..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐 अब गो कोरोना, तू गो कोरोना मौत की नींद  जा सो  कोरोना मर-बिला जा तू ऐसे सब बोलें अब किसी और भी नो कोरोना अबके आके तो मार डाला हमें अब कभी ऐसा  न हो कोरोना ता-क़यामत तिरा पता न चले जा तू ऐसे  कहीं खो कोरोना सारे जग को  हिला दिया तूने कितनी घातक बला हो कोरोना इस मुसीबत में तू हमारे बीच बीज नफ़रत के न बो कोरोना इक ख़ुदाई क़हर या अपनी ख़ता कुछ तो बोलो रे क्या हो कोरोना हम तिरा नाम तक मिटा देंगे हमसे पंगा  लिया जो कोरोना रैलियाँ  ख़ूब की  'जहद' तूने अब तू ले इस क़दर ढो कोरोना       ~जावेद जहद

कम न हुए हैं कुछ भी तो दर्द-ओ-अलम अभी..

          ताज़ा ग़ज़ल 💐 कम न हुए हैं कुछ भी तो दर्द-ओ-अलम अभी जग में भरे हुए हैं जी  ज़ुल्म-ओ-सितम अभी महफ़िल से, भीड़-भाड़ से सब दूर ही रहें ये वायरस तो कर रहा बिस्फोट बम अभी बढ़ती ही जा रही हैं हमारी मुसीबतें शायद रहेगा जारी ख़ुदा का सितम अभी कितने मज़े से घर में पड़े करते प्यार हम लेकिन न जाने है कहाँ मेरा सनम अभी समझेगा किस तरह वो कि होता है प्यार क्या रक्खा है राह-ए-इश्क़ में उसने क़दम अभी !! हम पे किया है तूने बहुत ही करम मगर हम पे ख़ुदाया और हो रहमो-करम अभी अपनी तो यारो कुछ भी नहीं हैं ये शोहरतें लाखों निसार होंगे ख़ुदा की क़सम अभी ! छोड़ो सियासतें न लड़ो इस घड़ी 'जेहद' सबको बचाने में ही लगाना है दम अभी          ~जावेद जहद

शराब पीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे..

           ताज़ा ग़ज़ल 💐 शराब पीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे नशे में जीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे ज़माने भर की ये चोट खाके, जहाँ के ग़म को गले लगा के ये ऐसे जीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे दो-चार दिन की ये ज़िंदगी में, दो-चार ख़ुशियों की चाहतों में यूँ मरते-जीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे न दुनिया से है तुम्हें मोहब्बत, न करते हो तुम किसी की ख़िदमत यहाँ पे जीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे तुम्हीं तो हो वर्तमान यारो, भविष्य भी हो तुम्हीं तो बंधू समय भी बीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे किसी से रिश्ता बना लिया तो, 'जेहद' उसी से जुड़े हो रहते यूँ सख़्त फ़ीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे           ~जावेद जहद

शिकस्ता दिल और मगन में है जी..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 शिकस्ता दिल और मगन में है जी ये कैसा दिल इस बदन में  है  जी लपकता उनपे ये दिल कभी था अब अपनी ही ये शरण में  है जी उन्हें है पाना बस एक धुन थी ये दिल कईं अब लगन में है जी हैं जाँद कितने तो कैसे कह दूँ कि चाँद बस इक गगन में है जी वो कैसा है जो लुटा के सबकुछ क़रार-ओ-चैन-ओ-अमन में है जी किसी भी शायर की कामयाबी बस उसके मश्क़-ए-सुख़न में है जी ये कैसा उड़ने का शौक़ जागा हर एक पंछी गगन में है जी ! उसे न तुम दो नज़र से देखो जो अपने ही इस वतन में है जी किसी भी तहज़ीब मेंं न होगी जो बात गंग-ओ-जमन में है जी 'जेहद' न जानो सहल इसे तुम बड़ा परिश्रम सुख़न में है जी ।      ~जावेद जेहद