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किसी को भी चाहो तो पूरी तरह से..

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          ताज़ा ग़ज़ल किसी को भी चाहो तो पूरी तरह से मोहब्बत निभाओ तो पूरी तरह से ! कि जल जाए हस्ती तुम्हारी लगन में अगन जो लगाओ तो पूरी तरह से !! ये आधी-अधूरी सी तारीफ़ क्या है किसी को सराहो तो पूरी तरह से ! शमा रफ़्ता-रफ़्ता भी जलती है लेकिन जलाओ-बुझाओ तो पूरी तरह से !! ग़ज़ल गीत का चाहे दोहे का दिल को जो शायर बनाओ तो पूरी तरह से !! निगाहों की मस्तानी अठखेलियों से किसी को लुभाओ तो पूरी तरह से ! करो कोई तौबा तो दिल से करो तुम गुनाहों पे आओ तो पूरी तरह से !! कई रूप होते हैं हर आदमी के जिसे आज़माओ तो पूरी तरह से हो चारों तरफ़ ही अमन ही अमन बस हसीं दिन जो लाओ तो पूरी तरह से !! हों आहें कराहें, धुआं, जाम, आंसू शब-ए-ग़म मनाओ तो पूरी तरह से ये आसां नहीं है 'जहद' शायरी भी तबा आज़माओ तो पूरी तरह से !!

सर-सब्ज़ वादियों के शगुफ़्ता गुलों की सेज..

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        ताज़ा ग़ज़ल सर-सब्ज़ वादियों के शगुफ़्ता गुलों की सेज ये है ख़ुदाया किन हसीं सी दुल्हनों की सेज तेरी अराइशों में कमी कुछ भी तो नहीं हर शय की है बिछी हुई सी झुरमुटों की सेज उम्र-ए-दराज़ कितनी ही चीज़ें हैं अंगिनत कितनी हैं जैसे पानियों में बुलबुलों की सेज ख़ुशहालों ने ही लूटी हैं दुनिया की दौलतें उनकी ही देन हैं ये सभी खंडरों की सेज कुछ को ख़ुदाया तूने ही दुखिया बना दिया और कुछ बिछाई दुनिया ने भी ग़मज़दों की सेज ये जो हसीन फूलों की हमने बिछाई है ये तो है वास्तव में सनम उल्फ़तों की सेज इक रोज़ उनकी याद मुझे आई इस क़दर शब भर जिगर पे बनती रहीं बिजलियों की सेज वो कौन है ज़मीं की तरह शांत सा 'जहद उसके भी दिल में है तो नहीं ज़लज़लों की सेज            जावेेद जहद

मुद्दत से मैं जो एक ग़ज़ल सोच रहा हूँ..

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        ताज़ा ग़ज़ल मुद्दत से मैं जो एक ग़ज़ल सोच रहा हूँ बनती नहीं वो उम्दा शकल सोच रहा हूँ वो जिससे निकलती हैं सदा आग की लपटें किस तर्ह खिला है वो कँवल सोच रहा हूँ !! हो जाए बरी जिससे जहाँ सारे दुखों से इक ऐसा ही मैं कोई अमल सोच रहा हूँ मुझ जैसा ज़माने में बशर कोई नहीं है क्या है कोई भी मेरा बदल सोच रहा हूँ कब सोती है जी चैन से ये आज की दुनिया कब नींद मे होता है ख़लल सोच रहा हूँ !! पहले तो तमन्नाओं में उलझा लिया ख़ूद को अब ज़िंदगी हो जाए सहल सोच रहा हूँ !! वो प्यार का इज़हार तो करते नहीं पहले कर दूंगा कभी मैं ही पहल सोच रहा हूँ ! दिल इश्क़ में बिगड़ा तो बिगड़ता ही रहा फिर कैसे कोई जाता है सँभल सोच रहा हूँ !! इक हद की बुलंदी लिए सोचा था 'जहद' कुछ अब उससे ज़रा आगे निकल सोच रहा हूँ !!                       जावेेद जहद सहसरामी

तुम न गुलशन के नज़ारे देखो..

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       ताज़ा ग़ज़ल तुम न गुलशन के नज़ारे देखो गुल, कली, बूटे हमारे देखो !! सुर्ख़ होंठों की शरारत, शोख़ी और आँखों के इशारे देखो !! दिल के दरिया में उतर कर मेरे जान-ए-मन अब न किनारे देखो इतने दीवाने जो बनते हो मिरे कोई पत्थर से न मारे देखो !! कौन थामेगा तुम्हें प्यार से यूँ मेरी बाँहों के सहारे देखो !! छोड़ो ये आसमाँ की सुंदरता चाँद और तारे हमारे देखो !! देखना है जो सनम अब तुमको मेरी नज़रों के सहारे देखो !! आज की रात नशीली है बहुत होश न बहकें तुम्हारे देखो !! हैं 'जहद' इश्क़ की भी शर्तें कुछ दिल कोई शर्त न हारे देखो !!     ~जावेद जहद करन सराय,सासाराम, रोहतास, बिहार

दिल बहुत घबरा रहा है आजकल..

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    ताज़ा ग़ज़ल दिल बहुत घबरा रहा है आजकल याद कोई आ रहा है आजकल !! कैसी-कैसी है मुसीबत आ रही होता क्या-क्या जा रहा है आजकल कल तलक जो भी यहाँ देखा नहीं वो समाँ दिखला रहा है आजकल जाने कब अच्छा ज़माना आए गा दिन बुरा ही आ रहा है आजकल नाम शोहरत, माल-ओ-ज़र और ऐश का सबको ही ग़म खा रहा है आजकल !! यूँ तो है वो सीधा-साधा सा मगर रंग क्या दिखला रहा है आजकल आजकल बहका हुआ है साक़िया लब से लब टकरा रहा है आजकल क्या वजह है ये जहाँ सारा 'जहद गर्दिशों में आ रहा है आजकल !!      ~जावेद जहद करन सराय,सासाराम, रोहतास, बिहार

वफ़ा बे-रंग होती जा रही है..

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     ताज़ा ग़ज़ल वफ़ा बे-रंग होती जा रही है ये दुनिया संग होती जारही है इधर फिर दोस्ती बढ़ने लगी है उधर से तंग होती जा रही है ! कहीं पे अम्न लाया जारहा है कहीं पे जंग होती जा रही है ठहाका मारती फिरती है नफ़रत मोहब्बत भंग होती जा रही है !! दिलों से मिटती जाती है मुसर्रत उदासी संग होती जा रही है !! बशर की देख कर हैवानियत अब ख़ुदाई दंग होती जा रही है !! ये दुनिया पहले भी थी बेहया सी या अब ये नंग होती जा रही है ? ये बाबाओं की अब तो असलियत पर ये दुनिया दंग होती जा रही है !! उन्हें फिर देख कर मेरी 'जहद' जी नज़र गुल-रंग होती जा रही है !!

मुझको उनसे हुई मोहब्बत जो..

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      ताज़ा ग़ज़ल मुझको उनसे हुई मोहब्बत जो क्या कहें फिर तो आई आफ़त जो उसका सम्मान क्या करे कोई अपनी ख़ुद ही लुटाए इज़्ज़त जो ऐसी बेदर्दी को तो आग लगे नाश के रखदे सब सियासत जो हो गए नंगे हर तरह से तुम क्या हुई तुझमें थी शराफ़त जो छा गई फिर हमारे चारों तरफ़ छोड़ आए थे हम जहालत जो इधर आएं जो चाहते इज़्ज़त वो उधर जाएं, चाहें ज़िल्लत जो लुत्फ़ आने लगा है शायरी में जबसे इसमें हुई महारत जो ! हमें क्या चाहिए ये मत पूछें आपकी मर्ज़ी, हो इनायत जो तुम शरारत कभी न ऐसी करो कि मुसीबत बने शरारत जो !! करो तामीर कोई ऐसी 'जहद' ढह न पाए कभी इमारत जो             जावेेद जहद सहसरामी