किसी को भी चाहो तो पूरी तरह से..

          ताज़ा ग़ज़ल

किसी को भी चाहो तो पूरी तरह से
मोहब्बत निभाओ तो पूरी तरह से !

कि जल जाए हस्ती तुम्हारी लगन में
अगन जो लगाओ तो पूरी तरह से !!

ये आधी-अधूरी सी तारीफ़ क्या है
किसी को सराहो तो पूरी तरह से !

शमा रफ़्ता-रफ़्ता भी जलती है लेकिन
जलाओ-बुझाओ तो पूरी तरह से !!

ग़ज़ल गीत का चाहे दोहे का दिल को
जो शायर बनाओ तो पूरी तरह से !!

निगाहों की मस्तानी अठखेलियों से
किसी को लुभाओ तो पूरी तरह से !

करो कोई तौबा तो दिल से करो तुम
गुनाहों पे आओ तो पूरी तरह से !!

कई रूप होते हैं हर आदमी के
जिसे आज़माओ तो पूरी तरह से

हो चारों तरफ़ ही अमन ही अमन बस
हसीं दिन जो लाओ तो पूरी तरह से !!

हों आहें कराहें, धुआं, जाम, आंसू
शब-ए-ग़म मनाओ तो पूरी तरह से

ये आसां नहीं है 'जहद' शायरी भी
तबा आज़माओ तो पूरी तरह से !!

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