मुझको उनसे हुई मोहब्बत जो..
ताज़ा ग़ज़ल
क्या कहें फिर तो आई आफ़त जो
उसका सम्मान क्या करे कोई
अपनी ख़ुद ही लुटाए इज़्ज़त जो
ऐसी बेदर्दी को तो आग लगे
नाश के रखदे सब सियासत जो
हो गए नंगे हर तरह से तुम
क्या हुई तुझमें थी शराफ़त जो
छा गई फिर हमारे चारों तरफ़
छोड़ आए थे हम जहालत जो
इधर आएं जो चाहते इज़्ज़त
वो उधर जाएं, चाहें ज़िल्लत जो
लुत्फ़ आने लगा है शायरी में
जबसे इसमें हुई महारत जो !
हमें क्या चाहिए ये मत पूछें
आपकी मर्ज़ी, हो इनायत जो
तुम शरारत कभी न ऐसी करो
कि मुसीबत बने शरारत जो !!
करो तामीर कोई ऐसी 'जहद'
ढह न पाए कभी इमारत जो
Comments