सर-सब्ज़ वादियों के शगुफ़्ता गुलों की सेज..
ताज़ा ग़ज़ल
ये है ख़ुदाया किन हसीं सी दुल्हनों की सेज
तेरी अराइशों में कमी कुछ भी तो नहीं
हर शय की है बिछी हुई सी झुरमुटों की सेज
उम्र-ए-दराज़ कितनी ही चीज़ें हैं अंगिनत
कितनी हैं जैसे पानियों में बुलबुलों की सेज
ख़ुशहालों ने ही लूटी हैं दुनिया की दौलतें
उनकी ही देन हैं ये सभी खंडरों की सेज
कुछ को ख़ुदाया तूने ही दुखिया बना दिया
और कुछ बिछाई दुनिया ने भी ग़मज़दों की सेज
ये जो हसीन फूलों की हमने बिछाई है
ये तो है वास्तव में सनम उल्फ़तों की सेज
इक रोज़ उनकी याद मुझे आई इस क़दर
शब भर जिगर पे बनती रहीं बिजलियों की सेज
वो कौन है ज़मीं की तरह शांत सा 'जहद
उसके भी दिल में है तो नहीं ज़लज़लों की सेज
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