वफ़ा बे-रंग होती जा रही है..


     ताज़ा ग़ज़ल

वफ़ा बे-रंग होती जा रही है
ये दुनिया संग होती जारही है

इधर फिर दोस्ती बढ़ने लगी है
उधर से तंग होती जा रही है !

कहीं पे अम्न लाया जारहा है
कहीं पे जंग होती जा रही है

ठहाका मारती फिरती है नफ़रत
मोहब्बत भंग होती जा रही है !!

दिलों से मिटती जाती है मुसर्रत
उदासी संग होती जा रही है !!

बशर की देख कर हैवानियत अब
ख़ुदाई दंग होती जा रही है !!

ये दुनिया पहले भी थी बेहया सी
या अब ये नंग होती जा रही है ?

ये बाबाओं की अब तो असलियत पर
ये दुनिया दंग होती जा रही है !!

उन्हें फिर देख कर मेरी 'जहद' जी
नज़र गुल-रंग होती जा रही है !!

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