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बिखरे हैं अपने ख़्वाब न जाने कहाँ-कहाँ..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 बिखरे हैं अपने ख़्वाब न जाने कहाँ-कहाँ हम तुमको ले चलें ये दिखाने कहाँ-कहाँ सोचा कि अपने दिल में छुपालूँ मैं ग़म मगर पहुंचे हैं मेरे ग़म के फ़साने कहाँ-कहाँ !! मुश्किल से आए हाथ जो क़ुर्बानियों के बाद हमने लुटा दिए वो ख़ज़ाने कहाँ-कहाँ !! ऐ चैन की हसीना, तू रहती है किस जगह भटके तिरी तलब में दिवाने कहाँ-कहाँ !! मेरी ग़ज़ल के आगे जो ख़ामोश थे पड़े गूँजा करेंगे अब वो तराने कहाँ-कहाँ !! मंज़िल की जुस्तजू में वो बचपन के यार सब लेते गए यहाँ से  ठिकाने कहाँ-कहाँ !! सबसे ही खुलके मिलना है उसकी अदा 'जहद' उसके दिवाने होंगे न जाने कहाँ-कहाँ !!       ~जावेद जहद

न अच्छी कोई उदासी, न कोई डर अच्छा..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 न अच्छी कोई उदासी, न कोई डर अच्छा हो अज़्म दिल में तो होता है हर सफ़र अच्छा वो जिसकी राह में चलती हो सिर्फ़ मक्कारी सफ़र ही अच्छा है उसका न हमसफ़र अच्छा वहाँ है दहशत-ओ-नफ़रत, यहाँ मोहब्बत है कि तेरे शह्र से है मेरा ये नगर अच्छा !! कोई तो अच्छा सा एज़ाज़ भी मिले उसको कि वाक़ई में जो रखता है इक हुनर अच्छा सुधार थोड़ा कहीं पे ये करके क्या होगा करो कुछ और भी तो रोग तुम दिगर अच्छा दुआ, दवाओं से, हिकमत से एक काम बना समझ में आए न किसका हुआ असर अच्छा न अच्छा हुस्न, न इख़लाक़ और न ख़सलत थी अजब वो शख़्स था, जो बन गया मगर अच्छा वो आँख खुलते ही झटके से जैसे टूट गया जो ख़्वाब देखा था कल मैंने रात भर अच्छा तुम्हारे साथ भी अच्छा करेगी ये दुनिया करोगे दुनिया का तुम जो 'जहद' अगर अच्छा       #जावेद_जहद

जावेद जहद की पाँच ग़ज़लें..

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       1..ग़ज़ल 💐 ग़ज़ल की दुनिया में भी अब बहार है कि नहीं सभी को कल की तरह इससे प्यार है कि नहीं मैं शायरी तो बहुत उम्दा करता हूँ लेकिन मिरा भी शायरों में कुछ शुमार है कि नहीं कि मैं भी कर सकूँ जिससे कि मार दुनिया में मिरी भी शायरी में ऐसी धार है कि नहीं !! करम किया जो मुझे तूने दिल दिया लेकिन मिरी भी तुम पे सनम जाँ निसार है कि नहीं वो बेपनाह मोहब्बत में डूबे रहने का नशा तो टूट चुका, अब ख़ुमार है कि नहीं क़रार दिल को मिलेगा ज़रूर ऐ यारो हाँ पहले देख तो लो बेक़रार है कि नहीं जो सारी दुनिया को करदे दुखों से दूर 'जहद' किसी को इतना बड़ा इख़्तियार है कि नहीं ! *********************************      2..ग़ज़ल 💐 दिल-ए-बेदार कोई अहले-नज़र है कि नहीं किस से पूछें कि कोई ऐसा बशर है कि नहीं छल-कपट, राहज़नी, ज़ुल्म-ओ-सितम, ख़ूँरेज़ी ये भी दो-रंगीं सियासत का समर है कि नहीं जिस तरफ़ देखिए बाज़ार-ए-हवस है यारो और ईसार-ओ-वफ़ा हममें सिफ़र है कि नहीं अम्न-ओ-इंसाफ़ की लुटती हुई दुनिया से उदास आज इस देश का इक एक बशर है कि नहीं !! अपना चेहरा भी बदल जाए तो हैरत कैसी आज बदली हुई दुनिया की नज़र...

मिरा हँसना, मिरा चलना, मिरा अंदाज़ तो देखो..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 मिरा हँसना, मिरा चलना, मिरा अंदाज़ तो देखो मिरी शोख़ी, मिरा नख़रा, मिरा ये नाज़ तो देखो अलग कथनी, अलग करनी, अलग अफ़्आल और आमाल मिरे अंदर, मिरे बाहर अजब है राज़ तो देखो !! अभी सीखा है उड़ना और छूता हूँ बुलंदी को कहाँ अश्आर मेरे और कहाँ परवाज़ तो देखो इधर अपने कबूतर की क़लाबाज़ी में तुम गुम हो चला आता है वो कैसे उधर से बाज़ तो देखो !! मिरे दुश्मन भी मुझको तो नज़र आते बड़े प्यारे कि मेरे देखने का ये मिरा अंदाज़ तो देखो !! मधुरता अब है गीतों में न सरगम में कोई जादू गरजते साज़ पे बस चीख़ती आवाज़ तो देखो किसी की भी नहीं सुनते, ये करते रहते मनमानी हुकूमत के अनोखे ये नए रंगबाज़ तो देखो !! वो लेके प्यार क्या आए 'जहद' मेरी पनाहों में मुझे भी आगया लो ख़ुद पे करना नाज़ तो देखो        #जावेद_जहद

किसी को खेत, किसी को मकां ज़ियादा है..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 किसी को खेत, किसी को मकां ज़ियादा है किसी के वास्ते बस आसमां ज़ियादा है !! कोई शरीफ़, कोई नेक है, कोई सीधा किसी को आन, किसी को गुमां ज़ियादा है कोई भी बात छुपाने से छुप नहीं सकती ज़माना पहले से अब राज़दां ज़ियादा है ज़रूर उसको भी लूटा है उसके अपनों ने कि उसके लब पे तो आह-ओ-फ़ुग़ां ज़ियादा है मिरे लिए तो सिवा साक़ी के वो कुछ भी नहीं मगर वो मुझपे तो कुछ मेहरबां ज़ियादा है !! जिधर को मिलती हैं बेचैनियां बहुत ज़्यादा ज़माना आज उधर ही रवां ज़ियादा है !! घना ये शह्र है, चारों तरफ़ यहाँ तो 'जहद' हवा में ज़ह्र भरा सा धुआं ज़ियादा है !!       ~जावेद जहद

नशा था,जल्वा-ए-दिलदार था, कल शब जहाँ मैं था..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 नशा था, जल्वा-ए-दिलदार था, कल शब जहाँ मैं था मिरी बाँहों में मेरा यार था, कल शब जहाँ मैं था !! दहकते थे ज़मीन-ओ-आसमां, वो आतिशी शब थी अजब वो शह्र शोलाबार था, कल शब जहाँ मैं था ! कली, ख़ुश्बू, हिना, फल, फूल उसके पास थे सबकुछ वो जैसे इक हसीं गुलज़ार था, कल शब जहाँ मैं था !! था आँखों से अयां कुछ भी, न होंठों से बयां कुछ भी कोई इंकार न इक़रार था, कल शब जहाँ मैं था !! जिगर घायल, नज़र पागल, ये मेरा दिल भी बेकल था अजब वो दो निगह का वार था, कल शब जहाँ मैं था जिसे मैंने कभी सपने में भी देखा नहीं यारो वहाँ वो हुस्न का बाज़ार था, कल शब जहाँ मैं था झपटता था वहाँ हर मर्द ज़न पे कुछ 'जहद' ऐसे क़यामत होने का आसार था, कल शब जहाँ मैं था          ~जावेद जहद

जावेद जहद की पाँच ग़ज़लें..

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     1..ग़ज़ल 💐 मोहब्बत तो होती है इक रात की शुरू फिर घड़ी इख़्तिलाफ़ात की वो पाकीज़गी अब कहाँ इश्क़ में ये शै बन गई है ख़ुराफ़ात की !! थी पहले तो शाम-ओ-सहर ही की फ़िक्र मगर अब तो उलझन है दिन-रात की !! अजब सरफिरा आदमी वो भी है लड़ाई वो करता है बे-बात की !! हैं उनके बिना क्या बहारों के दिन लगे रुत भी फीकी सी बरसात की वो जब सामने थे तो था जोश भी उठे लह्र अब कैसे जज़्बात की ? कही ख़ूब हमने ये ग़ज़लें तो क्या करिश्मे किए या करामात की !! ग़ज़ल में बहुत ही है जादू भरा करो बात इसके तिलिस्मात की ग़ज़ल से है मुझको तो उल्फ़त 'जहद' करो बात मुझसे ग़ज़लयात की !! ****************************       2..ग़ज़ल 💐 गुलाब अच्छे भी लगते हैं गुलसितां से कहाँ यहाँ खिले हैं तो जाएंगे हम  यहां से कहाँ यहाँ भी दर्द-मुसीबत, वहाँ भी स्वर्ग-नरक फ़रार मिलता है ये दे भी देने जां से कहाँ ये अस्र-ए-नव का चलन, तौबा माफ़ हो बाबा बिछड़ के आ गए हम तेरे कारवां से कहाँ !! ज़मीन, चाँद, फ़लक का सफ़र भी कर डाला अब और आगे भी हम जाएं आसमां से कहाँ हर एक मुल्क दिखाता है ताक़तें अपनी किसी को ग़र्ज़ भी है अम्न और अमां से कहाँ तमाम...