जावेद जहद की पाँच ग़ज़लें..

     1..ग़ज़ल 💐

मोहब्बत तो होती है इक रात की
शुरू फिर घड़ी इख़्तिलाफ़ात की

वो पाकीज़गी अब कहाँ इश्क़ में
ये शै बन गई है ख़ुराफ़ात की !!

थी पहले तो शाम-ओ-सहर ही की फ़िक्र
मगर अब तो उलझन है दिन-रात की !!

अजब सरफिरा आदमी वो भी है
लड़ाई वो करता है बे-बात की !!

हैं उनके बिना क्या बहारों के दिन
लगे रुत भी फीकी सी बरसात की

वो जब सामने थे तो था जोश भी
उठे लह्र अब कैसे जज़्बात की ?

कही ख़ूब हमने ये ग़ज़लें तो क्या
करिश्मे किए या करामात की !!

ग़ज़ल में बहुत ही है जादू भरा
करो बात इसके तिलिस्मात की

ग़ज़ल से है मुझको तो उल्फ़त 'जहद'
करो बात मुझसे ग़ज़लयात की !!
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      2..ग़ज़ल 💐

गुलाब अच्छे भी लगते हैं गुलसितां से कहाँ
यहाँ खिले हैं तो जाएंगे हम  यहां से कहाँ

यहाँ भी दर्द-मुसीबत, वहाँ भी स्वर्ग-नरक
फ़रार मिलता है ये दे भी देने जां से कहाँ

ये अस्र-ए-नव का चलन, तौबा माफ़ हो बाबा
बिछड़ के आ गए हम तेरे कारवां से कहाँ !!

ज़मीन, चाँद, फ़लक का सफ़र भी कर डाला
अब और आगे भी हम जाएं आसमां से कहाँ

हर एक मुल्क दिखाता है ताक़तें अपनी
किसी को ग़र्ज़ भी है अम्न और अमां से कहाँ

तमाम रौनक़ें ग़ायब सी होती जाती हैं
है लुत्फ़ प्यार के भी आता अब समां से कहाँ

चलो सजाएं, सँवारें इसे हमीं ख़ुद ही
ये बाग़ अब तो सँभलता है बाग़बां से कहाँ

वो पिछले लोग भी कितने ख़ुलूस वाले थे
कि अब वो चाँद सितारे से कहकशां से कहाँ

वही हैं अब भी ज़माने में पस्तियां क़ायम
पहुंच गया है ज़माना अगर कहाँ से कहाँ

हलाक जंग मेंं तो आदमी ही होते हैं
मिटेंगी नफ़रतें ये आग और धुआं से कहाँ

हमारे अह्द में दीवाने हैं सभी जैसे
तुम्हारे अह्द में थे ऐसे नौजवां से कहाँ

ज़मीं के शेर 'जहद' हो ज़मीं पे जो करलो
कि पार पासको गे तुम ये आसमां से कहाँ
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       3..ग़ज़ल 💐

हमारी इतनी ही दुनिया में मान ज़्यादा है
या हमको होना अभी भाग्यवान ज़्यादा है

कहीं पे देखो तो कितनी उठान है यारो
कहीं पे चारों तरफ़ बस ढलान ज़्यादा है

किसी को सारी ही चीज़ों पे है पकड़ जैसे
किसी को एक किसी पे कमान ज़्यादा है

किसी को सामने की चीज़ भी नहीं दिखती
किसी को गुप्त का भी जैसे ज्ञान ज़्यादा है

कोई शरीफ़, कोई नेक है, कोई सीधा
किसी को आन, किसी को गुमान ज़्यादा है

मिरे लिए तो सिवा साक़ी के वो कुछ भी नहीं
मगर वो मुझपे तो कुछ मेहरबान ज़्यादा है !!

निशां उसी का तो जग से कभी नहीं मिटता
कि कारनामों का जिसके निशान ज़्यादा है

वो जिसको चाहे बना दे महान पल भर में
हर इक महान से क़ुदरत महान ज़्यादा है

'जहद' ज़रूर ये छूलेगी अब तो ऊँचाई
तुम्हारी शायरी में अब उड़ान ज़्यादा है
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      4..ग़ज़ल 💐

सूद-ओ-ज़यां का अब न जग में हिसाब होगा
बस ख़्वाब-ख़्वाब होगा, बस ख़्वाब-ख़्वाब होगा

हैरत की बात भी अब कोई नहीं रहेगी
आला बनेगा अदना, अदना नवाब होगा

इंसान ने कभी ये सोचा न होगा हरगिज़
क़दमों में आदमी के वो माहताब होगा

हर शै का दाम इतना बढ़ जाएगा कि इक दिन
ख़ुशहाली का तसव्वर भी इक अज़ाब होगा !!

सच ही कहा गया है, आसार भी यही है
हर आने वाला दिन इससे भी ख़राब होगा

उर्यानियत अभी तो कुछ भी नहीं है यारो
इक रोज़ देखना तुम सब नंगा बाब होगा

दहशत-ज़दह हैं उनसे ख़ुद आपही 'जहद' जब
फिर उनमें ख़ौफ़ पैदा कैसे जनाब होगा ??
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    5..ग़ज़ल 💐

रुख़-ए-जमाल से पर्दा उठा रहा है कोई
नई बहार का जल्वा दिखा रहा है कोई

फ़ज़ा में प्यार की ख़ुश्बू है सुब्ह से फैली
हसीन शाम की महफ़िल सजा रहा है कोई

नज़र से दूर मिरी हो गया तो क्या ग़म है
दिल-ओ-दिमाग़ पे तो अब भी छा रहा है कोई

जहाँ की चोट से बिल्कुल बिखर चुका है मगर
जहाँ का साथ अभी तक निभा रहा है कोई !!

ये दिल तो भूल चुका हँसना दर्द में कबका
कि ये हँसी तो मुझे अब हँसा रहा है कोई

किसी ने प्यार मिरा दिल से है भुला डाला
मगर मैं कैसे भुलाऊँ मिरा रहा है कोई !!

हुआ है आज परेशां न जाने क्यों ये 'जहद'
दबा के लब को मगर मुस्कुरा रहा है कोई
             जावेेद जहद
करन सराय, सासाराम, बिहार

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