बिखरे हैं अपने ख़्वाब न जाने कहाँ-कहाँ..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐

बिखरे हैं अपने ख़्वाब न जाने कहाँ-कहाँ
हम तुमको ले चलें ये दिखाने कहाँ-कहाँ

सोचा कि अपने दिल में छुपालूँ मैं ग़म मगर
पहुंचे हैं मेरे ग़म के फ़साने कहाँ-कहाँ !!

मुश्किल से आए हाथ जो क़ुर्बानियों के बाद
हमने लुटा दिए वो ख़ज़ाने कहाँ-कहाँ !!

ऐ चैन की हसीना, तू रहती है किस जगह
भटके तिरी तलब में दिवाने कहाँ-कहाँ !!

मेरी ग़ज़ल के आगे जो ख़ामोश थे पड़े
गूँजा करेंगे अब वो तराने कहाँ-कहाँ !!

मंज़िल की जुस्तजू में वो बचपन के यार सब
लेते गए यहाँ से  ठिकाने कहाँ-कहाँ !!

सबसे ही खुलके मिलना है उसकी अदा 'जहद'
उसके दिवाने होंगे न जाने कहाँ-कहाँ !!

      ~जावेद जहद

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