नशा था,जल्वा-ए-दिलदार था, कल शब जहाँ मैं था..
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नशा था, जल्वा-ए-दिलदार था, कल शब जहाँ मैं था
मिरी बाँहों में मेरा यार था, कल शब जहाँ मैं था !!
दहकते थे ज़मीन-ओ-आसमां, वो आतिशी शब थी
अजब वो शह्र शोलाबार था, कल शब जहाँ मैं था !
कली, ख़ुश्बू, हिना, फल, फूल उसके पास थे सबकुछ
वो जैसे इक हसीं गुलज़ार था, कल शब जहाँ मैं था !!
था आँखों से अयां कुछ भी, न होंठों से बयां कुछ भी
कोई इंकार न इक़रार था, कल शब जहाँ मैं था !!
जिगर घायल, नज़र पागल, ये मेरा दिल भी बेकल था
अजब वो दो निगह का वार था, कल शब जहाँ मैं था
जिसे मैंने कभी सपने में भी देखा नहीं यारो
वहाँ वो हुस्न का बाज़ार था, कल शब जहाँ मैं था
झपटता था वहाँ हर मर्द ज़न पे कुछ 'जहद' ऐसे
क़यामत होने का आसार था, कल शब जहाँ मैं था
~जावेद जहद
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