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दो ग़ज़ल एक ही बहर में..

    1..ग़ज़ल 💐 पूरी कितनी होती है मन की बात कुछ ही पूरी होती है मन की बात झूठी-झूठी बातें करने वालों के झूठी-झूठी होती है मन की बात हम तो बस उसकी सुनते हैं जिसके विद्वानों सी होती है मन की बात !! मयकशों की महफ़िलों में सुनते हैं जी ख़ूब नशीली होती है मन की बात !! अंगूरों सी काया जिसकी, उसके तो बस अंगूरी होती है मन की बात !! गीत ग़ज़ल अफ़सानों में कुछ होती है सच और कुछ ख़्याली होती है मन की बात !! दिन में कैसी होती है पर रातों में बहकी-बहकी होती है मन की बात मिल जाते हैं आपस में जब दो मन मन से मन की होती है मन की बात उसकी तो न ख़त्म 'जेहद' होगी, जिसके सागर जैसी होती है मन की बात !! ****************************     2..ग़ज़ल 💐 देखो अब क्या होती है मन की बात हँसती है या रोती है मन की बात !! जन-जन तक जाती है या फिर यारो मन ही मन में खोती है मन की बात ख़ुश करती है कितनों को और कितनों को कितनी सूई चुभोती है मन की बात !! कितने ही फिसल जाते हैं इसपे तो कितनी चिकनी होती है मन की बात कुछ का कोई मोल नहीं लेकिन कुछ हीरे जैसी होती है मन की बात !! दुनिया की बात अगर चे सागर है तो फिर उसकी सोत...

ख़ुश्बू-ख़ुश्बू पवन से आती है..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 ख़ुश्बू-ख़ुश्बू पवन से आती है गुलबदन किस चमन से आती है जिस्म धरती का जब सुलगता है तब ये बारिश गगन से आती है ! रूह रौशन हो जिसकी, उसके तो रौशनी सी बदन से आती है !! मयकदे की ये सारी सर-मस्ती मुझको उनके नयन से आती है याद आती हैं कितनी ही बातें जब कोई शय वतन से आती है क्या खिलेगा वफ़ाओं का गुलशन ये खिलन तो मिलन से आती है ! प्यार ही प्यार हो 'जेहद' जिसमें प्रीत उसके सुख़न से आती है !     ~ जावेद जेहद

बाहर में जो दिल बहलाए..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 बाहर में जो दिल बहलाए घर में वो ख़ुद ही आग लगाए अपनों को जो भी ठुकराए ग़ैरों की वो ठोकर खाए !! धन के नशे में न इतराए कौन भला जग को समझाए हर दामन पे दाग़ है मैला सोच के कोई उंगली उठाए ज़ुल्म-ओ-सितम का, जौर-ओ-जफ़ा का दुनिया कब तक बोझ उठाए !! उनकी याद बहुत आती है सावन की रुत जब-जब आए लोग तरक़्क़ी कर गए लेकिन दिल में वही है हाए-हाए !! अपनी-अपनी सबको पड़ी है कौन किसे ख़ातिर में लाए !! झूठा वादा करते-करते क्या से क्या है वो बन जाए मिट गई लाज 'जेहद' जी देखो दुल्हन भी अब न शर्माए !!      ~ जावेद जहद

आज का डूबा कल निकले गा..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 आज का डूबा कल निकले गा सूरज फिर से चल निकले गा होगी फिर से मिल्लत हम में नफ़रत का फिर बल निकले गा आज उसे फिर देखा गुमसुम दिल का दर्द उबल निकले गा मेरा सीना चीर के देखो दिल ये गाते ग़ज़ल निकले गा कुछ नदी में कीचड़ रहने दो इसमें ही तो कँवल निकले गा पौधा जो भी धूप न झेले पेड़ वो कैसे सबल निकले गा चोरी करके, रिशवत देके क्या होगा जो फल निकले गा झूठे वादे करता है जो उसका प्यार तो छल निकले गा एक अकेले दम से कैसे दुनिया भर का हल निकले गा बुरा-बुरा जब काम हो, कैसे अच्छा कोई फल निकले गा ये ज़बाँ हमेशा फिसली 'जेहद' अब क्या ख़ाक सँभल निकले गा     ~ जावेद जहद

शाम-ओ-सहर,रोज़-ओ-शब चाहा..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 शाम-ओ-सहर, रोज़-ओ-शब चाहा कम इससे तुझको कब चाहा !! हद से ज़्यादा, ख़ुद से बढ़ के तेरा ही नाम-ओ-नसब चाहा कोई ग़ुल न किया न शोर किया चुपके से तुझे ब-अदब चाहा !! तूने तो चाहा कोई ग़रज़ से और मैंने तुझे बे-सबब चाहा हर वक़्त ही तेरी ख़्वाहिश की हर वक़्त ही ऐश-ओ-तरब चाहा कब से जो मुझपे मरता रहा मैंने उसे जाके अब चाहा !! दो-दो चेहरा रखने वाला क्या यार भी मैंने अजब चाहा सारे हुनर को छोड़ 'जेहद' जी मैंने तो बस ये अदब चाहा !!    ~ जावेद जहद

अब तो ऐसे पिघल गया सूरज..

      ताज़ा ग़ज़ल अब तो ऐसे पिघल गया सूरज जैसे हर फ़न का ढल गया सूरज आग ऐसी लगी ज़माने में उसके शोलों में जल गया सूरज चाँद कोई नदी में उतरा था देखते ही मचल गया सूरज चाँद और तारे खो गए खुद में जो फ़लक से निकल गया सूरज देख कर रौशनी नई जग में ग़ार में बैठा जल गया सूरज ! दाग़ तो दुनिया पर ही कम न थे अपने रुख़ पर भी मल गया सूरज शह्र की रात यूँ दमकती है जैसे खम्भों में फल गया सूरज इतना ग़ुब्बार फैला है कि 'जहद' उसका कोहरा निगल गया सूरज      ~ जावेद जहद

दो ग़ज़ल छोटी बहर में..

      1..ग़ज़ल 💐 सब आजकल बस छल है छल ये ज़िंदगी अच्छी थी कल हर मस्अला कब होगा हल हिम्मत है गर अब सब बदल आसान कर कर पग सरल सपनों से तू अब मत बहल दर्द-ओ-अलम से अब निकल सब मर गए मर तू भी चल छोटी बहर अच्छी ग़ज़ल बोले 'जहद' अब तो सँभल *********** 2..ग़ज़ल 💐 फ़तह मेरी कभी उसकी है सारी ही ख़ुशी वक़्ती लदे हैं फल झुकी टहनी हसीं बातें हैं सब उनकी सियासत है वही बिगड़ी परेशानी वही अब की ये दुनिया है ग़ज़ब रब की 'जहद' मुश्किल बहर छोटी !!  ~ जावेद जहद