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इक शम्मा और परवाने दो..

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           ताज़ा ग़ज़ल इक शम्मा और परवाने दो ! चलो एक को जल जाने दो ! बहुतों को मारा है उसने अब उसको भी मर जाने दो सरहद को पंछी क्या जानें बिन रोके आने-जाने दो !! बहुत दिनों की प्यास है साक़ी पैमाने पर पैमाने दो !! सर बहुत चढ़ाया है उनको अब दुश्मन को इतराने दो तुम बाद में दूरी कर लेना ज़रा पहले पास तो आने दो जो जिनकी यारी चाहे हैं उन्हें उनके ही याराने दो जो बर्बादी के सामाँ हैं अब दफ़्न उन्हें हो जाने दो हम सबका स्वागत करते हैं जो आता है उसे आने दो ! फिर होश मिरा तुम ले लेना ज़रा पहले होश तो आने दो दिल जिसको चाहे ख़ूब 'जहद' उसपे ही उसे लुट जाने दो !!                जावेेद जहद

ज़माना है बुरा, सरकार से भी कुछ नहीं होता..

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           ताज़ा ग़ज़ल ज़माना है बुरा, सरकार से भी  कुछ नहीं होता किसी को डर ख़ुदा की मार से भी कुछ नहीं होता भला, मेहर-ओ-वफ़ा, ईसार से भी कुछ नहीं होता कि अब तो आजज़ी और प्यार से भी कुछ नहीं होता वो न चाहे अगर तो उसके दिल में फिर किसी सूरत हज़ारों प्यार के इज़हार से भी कुछ नहीं होता !! वो बाँहों में चला आए तो फिर कुछ बन ही आता है फ़क़त महबूब के दीदार से भी कुछ नहीं होता !! जो होना हो अगर तो प्यार से भी हो ही जाता है नहीं तो तोप से तलवार से भी कुछ नहीं होता !! ये मुमकिन है ग़ज़ल मेरी सधारण सी ही लाए रंग असर लोगों में अब मेआर से भी कुछ नहीं होता ! किसी मुफ़लिस ने जबसे मुफ़लिसी से दिल लगाया है उसे ज़र-माल के अम्बार से भी कुछ नहीं होता !! उजड़ जाए किसी के दिल के गुलशन की जो शादाबी उसे फिर रौनक़-ए-गुलज़ार से भी कुछ नहीं होता !! ये बातें हैं उसूलों और मिज़ाजों की 'जहद' अपने कि मेरा दिल ख़फ़ा अग़यार से भी कुछ नहीं होता                 जावेेद जहद

आशिक़, मजनूँ, दीवाना था..

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         #ताज़ा_ग़ज़ल आशिक़, मजनूँ, दीवाना था मैं तेरे लिए क्या- क्या ना था बस प्यार की बातें होती थीं अपना भी वो क्या ज़माना था दिल मेरा  प्यासा था तेरा आँखों का तिरी पैमाना था हर रात शमा तू बनती थी मैं बन जाता  परवाना था हम सारी हद से गुज़र जाते बस रौ में हमें बह जाना था जो प्यार में  गाते रहते थे कितना वो प्यारा गाना था तूने ही कभी  मौक़ा न दिया क्या-क्या तुमको बतलाना था ख़्वाबों की परी थी, हो गई छू उड़ जाने का तो बहाना था !! महलों से उठी चिंगारी थी और ख़ाक हुआ काशाना था ये नफ़रत, वो उलफ़त का 'जहद' इक ये है, इक वो ज़माना था !!                       जावेेद जहद

जिसका दिल ग़म से भरा रहता है..

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          ताज़ा ग़ज़ल जिसका दिल ग़म से भरा रहता है वो तो मज़बूत  बड़ा  रहता  है !! बात तो करता है वो सेवा की पर लुटेरा ही  बना  रहता  है वो हमें राह  दिखाए कैसे ख़ुद फँसा राहनुमा रहता है जो नज़र आते हैं ख़ुशहाल बहुत हाल उनका भी  बुरा  रहता  है ! वस्ल के फूल बिखर जाते हैं हिज्र का ज़ख़्म  हरा रहता है उनसे जितना भी मिला जाए मगर उनके होंठों पे  गिला  रहता  है !! जाने क्यों भीड़ से वो भागे है जाने क्यों तन्हा  सदा रहता है ख़ाक में जिस्म तो मिल जाते हैं रूह का जलवा  सदा रहता है ! आके फिर धड़कनों को बढ़वा दो दिल का सीमाब  घटा रहता है !! शेर कहते रहो हर वक़्त 'जहद' इस तरह ज़ह्न  खुला रहता है !                  जावेेद जहद

मत पूछिए कि ग़ज़लों से क्या-क्या बना लिया..

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            #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 मत पूछिए कि ग़ज़लों से क्या-क्या बना लिया इस फ़न से सारी दुनिया को अपना बना लिया मुश्किल सुख़न से होती है उलझन सभी को अब आसान मैंने इस लिए लहजा बना लिया !! सच बात वो कहें तो कहें कैसे दोस्तो दिल में तो उनके झूठ ने डेरा बना लिया तुम भी तो हो गए हो किसी हुक्म के ग़ुलाम हमने भी इक सदा को है आक़ा बना लिया ! आपस के मस्अलों में ये ग़ैरों का दख़्ल क्यों ऐ दोस्त तूने कैसा तरीक़ा बना लिया ? कुछ ऐसे शौक़ में सभी लोगों ने डूब कर अब ख़ुद को इक तरह से है तन्हा बना लिया करते ही जा रहे हैं सितम पे सितम 'जहद' लोगों ने कैसा-कैसा मसीहा बना लिया !!               जावेेद जहद 

आग, पानी, चाँदनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा..

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               #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 आग, पानी, चाँदनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा है यही तो  ज़िंदगी,  रौशनी, ख़ुश्बू, हवा तीरगी, बदबू, उमस, ज़िंदगी की बेकली ज़िंदगी की चाशनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा इक जगह जब हों ये तो सुर सजे संगीत का ये भी जैसे रागिनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !! आज कोई जश्न है या किसी का वस्ल है आज कितनी है खिली, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा तुम थे मेरे साथ तो कितनी मेरे पास थी तुम गए तो खो गई, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा इक फ़रेबी हुस्न और मसनवी श्रृंगार है शह्र में न गाँव सी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा ! अंगिनत अल्फ़ाज़ हैं, अंगिनत मौज़ू मगर किसकी है न शायरी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा ये यहाँ की शय नहीं, इसमें कोई शक नहीं ये तो हैं जी जन्नती, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !! कहते हैं क्या-क्या सभी, मैंने भी ये कह दिया इल्म और शाइस्तगी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !! तेज़ भाती है किसे, हर किसी को ही 'जहद' अच्छी लगती गुनगुनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !!                  जावेेद जहद सहसरामी

तुम्हारी क्या वफ़ा है, हम नहीं समझे..

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        ताज़ा ग़ज़ल तुम्हारी क्या वफ़ा है, हम नहीं समझे लहर,आंधी है क्या है, हम नहीं समझे ये सब कैसी अदा है, हम नहीं समझे मिलन में लब सिला है, हम नहीं समझे तुम्हारे भेद तो हैं  सारे ही न्यारे तुम्हारा रूप क्या है, हम नहीं समझे हमारी क्या लगन है, जानते हो तुम तुम्हारी चाह क्या है, हम नहीं समझे तड़पता है तुम्हारा दिल मिलन को जब क़दम फिर क्यों रुका है, हम नहीं समझे तुम्हें हम भूलना तो  चाहते हैं पर तुम्हीँ में दिल लगा है, हम नहीं समझे बहुत नज़दीक से देखा मगर फिर भी मोहब्बत क्या बला है हम नहीं समझे ये कैसा है सियासत का जहाँ यारो कि इसका धर्म क्या है, हम नहीं समझे किसी की लूट कर इज़्ज़त 'जहद' आख़िर किसी को क्या मिला है, हम नहीं समझे !!                   जावेेद जहद सहसरामी