हाए वो साक़ी भी कितना बेख़बर, बेहोश है..

    #ताज़ा_ग़ज़ल 💐

हाए वो साक़ी भी कितना बेख़बर, बेहोश है
जिसकी चश्म-ए-मस्त ने मेरा उड़ाया होश है

तेरे दीवाने को ऐसा अब जुनूं का जोश है
अक़्ल क़ायम है न उसकी और न बाक़ी होश है

होश में आने तो दो रख लीजियो मुँह पर नक़ाब
देखने वाला तुम्हारे हुस्न का बेहोश है !!

देख ये पर्दा तिरा अच्छा नहीं पर्दा-नशीं
मेरी आँखों में समाकर मुझसे क्यों रूपोश है

वो गए उठ कर बहार-ए-हुस्न दिखला कर तो क्या
दर्द से रहता नहीं ख़ाली कभी आग़ोश है !!

वाँ उन्हें सजने-सँवरने से ज़रा फ़ुर्सत नहीं
देखने वाला यहाँ बेहोश है, बेहोश है !!

हो गया फेरा तुझे किस बुत का बोलो तो 'जेहद'
हाल क्यों बेहाल है ये, क्यों ज़बाँ ख़ामोश है ?
         #जावेेद_जेेेहद
करन सराय, सासाराम, बिहार

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