जब बुरे दिन उमड़ने लगते हैं..

    ताज़ा ग़ज़ल 💐

जब बुरे दिन उमड़ने लगते हैं
काम सारे  बिगड़ने  लगते हैं

कुछ न मिलता है जब उखाड़ने को
गड़े मुर्दे  उखड़ने  लगते हैं !!

घिर गया समझो वो मुसीबत में
जिसके सब पीछे पड़ने लगते हैं

ख़ुश रहें, बाल ही झड़े जिनके
ग़म में तो लोग झड़ने लगते हैं

अम्न हो कैसे, अब कहीं न कहीं
रोज़ ही लोग लड़ने लगते हैं !!

सड़े दाने से गर अलग न करें
अच्छे दाने भी सड़ने लगते हैं

मर गए कितने फिर भी उड़ न सके
कितने आते ही उड़ने लगते हैं !!

ख़ुश वो होते हैं दाद देने से
हो खिंचाई बिगड़ने लगते हैं

उनको हारा हुआ ही रहने दो
जीत कर जो अकड़ने लगते हैं

लोगों को क्या समझते हैं वो 'जेहद'
बेवजह ही  पकड़ने लगते हैं !!
              जावेद जेहद (जमशेद अख़्तर)
करन सराय, सासाराम, रोहतास, बिहार, इंडिया

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