ये जन्नत से गुलिस्तां को जहन्नम सा बना डाला..
#ताज़ा_ग़ज़ल 💐
ये जन्नत से गुलिस्तां को जहन्नम सा बना डाला
मोहब्बत के नगर में नफ़रतों का सुर जगा डाला
तुम्हें तो इसपे अपना दिल बिछाना चाहिए था बस
मगर तुमने दहकते शोलों का दरिया बिछा डाला
वो कितनी ही सुरीली थी यहाँ की मौसिक़ी यारो
जिसे बम के धमाकों से मगर कबका दबा डाला
पिदर की लाठियां कितनी, मदर की गोदियां कितनी
याँ कितनी दुल्हनों की मांग का सेंदुर मिटा डाला !!
कली गुल बूटे नहरें झील पर्वत और सबको ही
मैं सच कहता हूँ तूने ख़ून के आंसू रुला डाला
चहकता था, दमकता था कभी ये तो, मगर अब तो
गिरा के लाखों लाशें भूतों का डेरा बना डाला !!
ये सबसे अच्छी थी तफ़रीह की यारो जगह लेकिन
यहाँ तो हर तरफ़ ही ख़ौफ़ का साया बिछा डाला
अहिंसा के दिवाने थे कभी हम सारे ही कितने
सो ये भी नफ़रतों के खेल में कबका भुला डाला
बदल डाली हक़ीक़त उनकी, सच्चाई बदल डाली
पुरानी हर कहानी को नई सूरत में ला डाला !!
कभी ग़ुस्सा रहे ठंडा तो तुम ये सोचना यारो
कि हक़ इंसानियत का आजतक कितना निभा डाला
'जेहद' लगता है उन झगड़ों का कोई हल न निकलेगा
पुराना कर जिन्हें दुनिया ने पेचीदा बना डाला !!
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