ऐ तबीब अच्छी नहीं बेकार ये तदबीर है..
#ताज़ा_ग़ज़ल 💐
ऐ तबीब अच्छी नहीं बेकार ये तदबीर है
पास तेरे दर्द-ए-दुनिया की नहीं अकसीर है
सुनते क्यों हो, छोड़ दो तन्हा ही उनको दोस्तो
ज़ह्र से होती लबालब जिनकी भी तक़रीर है
दिल को छलनी-छलनी कर देती हैं तेरी बोलियां
तुम जिसे कहते हो भाषण, यार वो तो तीर है !!
जितने हैं वासी यहाँ के सबका ही ये देश है
ये कोई दो-चार लोगों की नहीं जागीर है !!
उसपे इक भी नीच हरकत शोभा देती ही नहीं
जिसकी शोहरत और इज़्ज़त यारो आलमगीर है
आप कितने प्यार से मिलते हैं सबसे मरहबा
मेरे मिलने के लिए तो आपकी शमशीर है !!
क्या पता ये कितने लम्बे रास्तों को तय करे
छोटे क़दमों से अभी ये चल रही तहरीर है !!
इस जुनूँ में अल्ला-अल्ला ख़ब्त तो देखो ज़रा
फिर रहा हूँ शान से जब ख़ाक दामनगीर है !!
पर्स में, कॉपी में, दिल में, तकिया में रहती है ये
तुमसे तो अच्छी तुम्हारी ये सनम तस्वीर है !!
उलझी ज़ुल्फ़ों में 'जेहद' उलझा तो उलझा ही रहा
ये असीरान-ए-मोहब्बत के लिए ज़ंजीर है !!
करन सराय, सासाराम, बिहार, इंडिया
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