सियासत में क्या-क्या न मक्कारियाँ हैं..
#ताज़ा_ग़ज़ल 💐
सियासत में क्या-क्या न मक्कारियाँ हैं
भरी इसमें सारी ही अय्यारियाँ हैं !!
किसी शख़्स ने दिल करोड़ों के जकड़े
ख़ुदाया ये कैसी गिरफ़्तारियाँ हैं !!
हुआ कुछ भला जब न लोगों का उनसे
तो अब जान देने की तैयारियाँँ हैं !!
न जाने ज़माना अब आएगा कैसा
बहुत ही मुझे ये तो बेज़ारियाँ हैं !!
मुझे पूछते हैं वो बज़्म-ए-अदू में
छुपी इसमें उनकी तो मक्कारियाँ हैं
'जहद' अब कहीं भी सुकूँ न मिलेगा
कि चारों तरफ़ अब तो दुश्वारियां हैं
अभी कुछ हैं सोए, अभी कुछ हैं जागे
अभी तो अधूरी सी बेदारियाँ हैं !!
अगर लुत्फ़ आता नहीं है तो समझो
कि आधी-अधूरी सी फ़नकारियाँ हैं
हमारी ग़ज़ल में भरा क्या नहीं है
नदी चाँद सूरज, शजर झाड़ियाँ हैं
बहादुर समझते हैं ख़ुद को बहुत जो
'जेहद' कुछ तो उनकी भी लाचारियाँ हैं
करन सराय, सासाराम, बिहार, इंडिया
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