अब फ़स्ल-ए-गुल क्या आएगी, बर्बाद गुलिस्तां कर बैठे..
#ताज़ा_ग़ज़ल 💐
अब फ़स्ल-ए-गुल क्या आएगी, बर्बाद गुलिस्तां कर बैठे
मजबूर थे अपनी फ़ितरत से सो काम ये शैतां कर बैठे
कुछ ऐसे भी आशिक़ होते हैं जो उनके वस्ल की चाहत में
कुछ हो न सका जब उनसे तो ख़ुद चाक गिरेबां कर बैठे
ऐ महू-ए-हैरत देख ज़रा, दीवार ने दर ख़ुद खोल दिया
तुम कितने बहादुर बनते थे, फिर आज क्यों ज़िंदां कर बैठे ?
ये रस्म-ए-मोहब्बत ख़ूब रही, ग़ैरों से मिले और हमसे छुपे
अब लौट के वो क्या आएंगे, जब कूच का सामां कर बैठे
है वादी-ए-उलफ़त ख़ूब हसीं, ये उनके हुस्न का जादू है
वो जब भी आए बन-ठन के, हर सम्त बहारां कर बैठे
ये हैरानी की दुनिया है, हर वक़्त यहाँ हैरानी है
हम उनसे कभी हैरान हुए, कभी उनको हैरां कर बैठे
हर शै की क़ीमत बढ़ने लगी, कोई बात नहीं लेकिन अफ़सोस
अनमोल थीं जितनी भी चीज़ें, हम उनको अरज़ां कर बैठे
कितने ही बड़े उस्तादों ने तो कर दिया रौशन शेर-ओ-सुख़न
पर हम भी 'जेहद' इस दुनिया में कुछ और चराग़ां कर बैठे !!
करन सराए, सासाराम, बिहार
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