कबतक छुपाने से ये छुपेगी नज़र की चोट..

      #ताज़ा_ग़ज़ल 💐

कब तक छुपाने से ये छुपेगी नज़र की चोट
हो जाएगी कभी तो अयाँ इस जिगर की चोट

लहरा रही है ज़िंदगी मस्ती में रात-दिन
जिस दिन से हमने खाई है तिरछी नज़र की चोट

हाए रे महजबीन ये बिगड़ें तो सर चढ़ें
सहमें तो मुस्कुरा के लगाएं गुहर की चोट

मस्ती में जब भी याद मुझे उनकी आ गई
घबरा के घर से निकले लगी संग-ए-दर की चोट

अर्ज़-ए-तमन्ना सुनके वो ऐसे भड़क उठे
जैसे कि दे उक़ाब कोई बाल-ओ-पर की चोट

फेंका जो फूल सम्त-ए-अदू उसने नाज़ से
आके इधर लगी मुझे हाए उधर की चोट !

सच है कि हो ही जाता है मज़बूत वो बहुत
खा लेता है जो शख़्स यहाँ दुनिया भर की चोट

लेने न देगी चैन उमर भर ये क्या हमें
रह-रह के उठ रही है 'जेहद' क्यों जिगर की चोट
           जावेेद जेेेहद (जमशेद अख़्तर)
करन सराय, सासाराम, बिहार, इंडिया

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