इक अदा-ए-हुस्न यूँ इतरा गई..

   #ताज़ा_ग़ज़ल 💐

इक अदा-ए-हुस्न यूँ इतरा गई
जैसे उसपे फिर जवानी छा गई

ख़ुश्बू-ख़ुश्बू बनके वो लहरा गई
सांस कितने शख़्स की महका गई

उसकी आँखों से जो पीली मैंने भी
मुझको भी तो वो कहीं बहका गई

देख कर शोला-मिज़ाजी आप की
जंगजूओं को भी हैरत आ गई !!

ज़िंदगी से मैं तो करता प्यार था
मौत क्यों कमबख्त़ मुझको खा गई

शाम-ए-ग़म में आरज़ू-ए-लुत्फ़ क्या
याद उनकी आते ही समझा गई !!

देख कर आँखों की बारिश आपकी
बादलों की बूंद भी शर्मा गई !!

मैं तो उनके वस्ल का दीवाना था
फिर जुदाई लेके क्यों सहरा गई ?

फिर 'जेहद' के दिल को है सब्र-ओ-सुकूं
क्या बला फिर मेरा रस्ता पा गई ?
             #जावेेद_जेेेहद
करन सराय, सासाराम, रोहतास, बिहार

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