उसकी तो कभी हो सकती नहीं गिनती अच्छे रहबर में..
#ताज़ा_ग़ज़ल 💐
उसकी तो कभी हो सकती नहीं गिनती अच्छे रहबर में
ख़ून लगा हो मज़लूमों का यारो जिसके ख़ंजर में !!
अच्छे दिन लाने वाले कितने आए और चले गए
फिर भी ख़ुशहाली न आई अबतक यारो घर-घर में
राजा हो या रंक जहाँ में जब सारे ही बराबर हैं
तो किसको छोटा-बड़ा कहें हम, कौन नहीं है हमसर में
कितने लश्कर से ऊपर उठ जाते हैं उठते-उठते
और कितने गुम हो जाते हैं गिरते-गिरते लश्कर में
सारे ही इंसान को जो ख़ुशहाल बना दे पूरी तरह
ख़ूबी ये जाने क्यों न आई अबतक कोई रहबर में
बाहर से क्या समझ सकोगे किसी की तुम मक्कारी को
सबका ही तो फ़रेब छुपा रहता है उसके अंदर में !!
कितने पड़े रहते हैं ठंडे कितने-कितने सालों तक
आग लगी रहती है हरपल और कितने ही बिस्तर
तुम लड़कियों के पीछे ज़्यादा कभी न भागा करो 'जेहद'
जान चली जाती है कितनी अक्सर उनके चक्कर में !!
करन सराय, सासाराम, रोहतास, बिहार
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