दो ग़ज़ल #कोविड-19 #लॉक्डाउन की..

      "दो ग़ज़ल 2020 लॉक्डाउन की"

1..ग़ज़ल 💐

हालत बहुत बुरी है जी घर में पड़े पड़े
पूंजी सरक गई है जी घर में पड़े पड़े !

होने लगी है सुस्त तबीयत भी अब मिरी
बस नींद आरही है जी घर में पड़े पड़े !!

लगता है हमसे काम न अब तो हो पाएगा
आदत बिगड़ गई है जी घर में पड़े पड़े !!

कितनी ग़ज़ल बनाई है हमने जहाँ-तहाँ
लेकिन ये तो बनी है जी घर में पड़े पड़े

बरसात भी कटे न कहीं अब इसी तरह
गर्मी जो ये कटी है जी घर में पड़े पड़े !

और कुछ मिला या न मिला हमको तो काम से
राहत बहुत मिली है जी घर में पड़े पड़े !!

दिन-रात जो लगे हैं बचाने में लोगों को
उनको दुआएं दी है जी घर में पड़े पड़े

अच्छा न लग रहा है मुझे कुछ भी इसलिए
कुछ ही ग़ज़ल कही है जी घर में पड़े पड़े

निर्भर है रहना ख़ुद पे 'जेहद' अब तो सोच लो
दौलत किसे मिली है जी घर में पड़े पड़े !!
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      2..ग़ज़ल 💐

फिर आई है सबको सताने ग़रीबी
ये जाएगी कैसे न जाने ग़रीबी !!

अभी कितना ख़ुशहाल है ये ज़माना
ये आई है सबको बताने ग़रीबी !!

बहुत ज़्यादा तकलीफ़ में लोग थे सब
तभी ये लगी यूँ भगाने ग़रीबी !!

मुसलसल दो पैसा एल आई सी के साथ
लगी बात ये क्या सुझाने ग़रीबी !!

ग़रीबों को ज़्यादा सताएगा जो भी
उसे भी लगेगी सताने ग़रीबी !!

वबा आती है तो ग़रीबों की ज़्यादा
ये लगती है चिंता बढ़ाने ग़रीबी !!

मिटेगी तभी ये मददगारों को जब
ये सच में लगेगी रुलाने ग़रीबी !!

शहर, गांव, जंगल में मर मर के ऐसे
'जेहद' ख़ाक कबतक ये छाने ग़रीबी
            जावेेद जेेेहद (जमशेद अख़्तर)
         करन सराय, सासाराम, रोहतास, बिहार

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