कि फूलों से जब-जब सबा खेलती है..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐

कि फूलों से जब-जब सबा खेलती है
बहारों के दिल की  गली  झूमती है !!

फ़ज़ाओं में कोयल जो मुँह खोलती है
तो हर दिल में मीठा सा रस घोलती है

समंदर की लहरों की अठखेलियों पर
तबीयत ये किसकी नहीं डोलती है !!

बरसती ये रिमझिम सी बरसात में तो
बदन में अजब सी अगन दौड़ती है !!

हर इक शै ही जैसे नई सी लगे है
सुबह में जो पहली किरन फूटती है

जो गिरती है कलियों पे चुपके से शबनम
तो उनमें जवानी का रस घोलती है !!

बनारस में ढलते ही जलवा सुबह का
सहर बनके शाम-ए-अवध जागती है

ख़िज़ाँ का भी अपना नज़ारा है यारो
हर इक शाख़ अपना बदन खोलती है

छुपे हैं जो दुनिया में कितने नज़ारें
'जेहद' उनकी भी इक अलग दिलकशी है

    ~ जावेद जेहद

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