हज़ारों ग़म में घिरी है लेकिन मना ही लेती ये हर ख़ुशी है..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐

हज़ारों ग़म में घिरी है लेकिन मना ही लेती ये हर ख़ुशी है
ये कैसी मस्तानी ज़िंदगी है, ये कैसी मतवाली ज़िंदगी है

कोई ख़ुशी के नशे में जीता, कोई ग़मों का है जाम पीता
हर इक बशर की ही अपनी-अपनी, अलग तरह की ये मयकशी है

ये इक जहाँ में जहाँ है कितना, हर इक जहाँ में मज़ा है कितना
कोई किसी में, कोई किसी में, है डूबा ये भी तो बंदगी है

वो शान-ओ-शौकत, वफ़ा-मोहब्बत, वो आबरू और दया-मरव्वत
पुरानी बातों को छोड़ो यारो, ये दुनिया आगे निकल चुकी है

तलाब कोड़ो लगाओ पौधे, सजाओ गुलशन बचाओ जीवन
इसे बनाओ हरा-भरा फिर, ये दुनिया काफ़ी उजड़ चुकी है

ज़रा सा छूलूँ जो मैं तुम्हें तो उछलने लगती हो तुम बहुत ही
तुम्हारे जानम ये तन-बदन में, न जाने कितनी ही गुदगुदी है

बड़ी रवानी भरी है इसमें, धुनें भी प्यारी छिपी हैं इसमें
ये जिस बहर में ग़ज़ल है यारो, क़सम से ये तो हसीं बड़ी है

यक़ीं करो ये बहुत ही उम्दा, बहुत ही आला सी होगी इक दिन
अभी तो अपनी ये कुछ नहीं है, अभी ये सीधी सी शायरी है

'जेहद' तुम्हारा बहुत बड़ा ये, समझ लो दुख दूर हो गया है
कि अब तुम्हारी तो शायरी में, कहीं से भी न कोई कमी है

       ~जावेद जेहद

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