मैं जिस ज़माने में ख़्वाब में था..
ताज़ा ग़ज़ल 💐
मैं जिस ज़माने में ख़्वाब में था
बड़े ही तब पेच-ओ-ताब में था
समझ में आई ये ज़िंदगी जब
अवारा दिल ये अदाब में था
थी महफ़िलों में सियाही सारी
उजाला सारा किताब में था
बड़ा ही दिलकश था हुस्न उसका
कि चाँद जब तक हिजाब में था
वो उनकी चाहत की मस्तियाँ थीं
कहाँ मैं डूबा शराब में था
था मेरी तोपों की टोह में वो
मैं उसके बम के हिसाब में था
वही तमाशा, लड़ाई, झगड़ा
वही समाँ इंतेख़ाब में था
ये उलझनों से भरा ज़माना
ये इतना कल न अज़ाब में था
भटक रहा है ज़माना जिसमें
ये रस्ता तो इंतेख़ाब में था
बिकार बैठा था जब 'जेहद' मैं
कभी न यूँ इज़्तिराब में था
~जावेद जेहद
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