कहाँ से आगया ये ज़िंदगी में दोराहा..
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कहाँ से आगया ये ज़िंदगी में दोराहा
दिखाई देता है अब हर किसी में दोराहा
ये दोहरी ज़ात इकहरी बना दे या अल्लाह
वगरना होगा तिरी बंदगी में दोराहा !!
बस इक ख़्याल का अफ़साना अच्छा होता है
मगर ये ख़ूब है जी शायरी में दोराहा !!
समझ में आती नहीं है किसी की मक्कारी
हर इक की बात में, आंसू, हँसी में दोराहा
तमाम क़ौल-ओ-अमल में तज़ाद है उनके
है ख़ूब ये भी सियासतगरी में दोराहा !!
लगा के दिल जुदा हम हो गए निगाहों से
यहाँ भी आगया लो आशिक़ी में दोराहा
इकहरी ज़िंदगी का बोझ ही गिराँ है मुझे
कभी न आए मिरी ज़िंदगी में दोराहा !!
हमारी एकता मशहूर है ज़माने में
'जहद' न आए कभी इस गली मेंं दोराहा
~ जावेद जहद
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