कहाँ-कहाँ की फ़िज़ा में न लहलहाई ग़ज़ल..
ताज़ा ग़ज़ल 💐
कहाँ-कहाँ की फ़िज़ा में न लहलहाई ग़ज़ल
ज़मीन-ओ-आस्मां ख़ुद में समेट लाई ग़ज़ल
वो ख़ुशनसीब हैं शायर कि जीते जी जिनकी
ज़मीन-ओ-आस्मां, शम्स-ओ-क़मर पे छाई ग़ज़ल
न छोड़ा कोई विषय, कोई बात भी इसने
तमाम दुनिया को ख़ुद में समो है लाई ग़ज़ल
ग़ज़ल कही गई कसरत से ख़ूब दुनिया में
है गायकों ने भी ज़्यादा ही तर तो गाई ग़ज़ल
मिरी ग़ज़ल को तो वो भी क़सम से सुनते हैं
जिन्हें कभी भी न मैंने कहीं सुनाई ग़ज़ल !!
दिवाने कितने नज़र इसके आते हैं वो भी
है जिनके वास्ते दुनिया में ये पराई ग़ज़ल
न जाने कौन सी चमके गी उनमें तारों सी
बना-बना के हवा में जो है उड़ाई ग़ज़ल !
इसे निहारो, सराहो, लगा लो दिल से 'जहद'
बड़े ही प्यार से है मैंने ये बनाई ग़ज़ल !!
~ जावेद जहद
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